
एक ऐसा अंचल ,
जिससे खींचा सबने पीछे।
ना बढ़ना मिला ,
पर ना रुका वो,
छोटी छोटी झोपड़ियों में ,
जल रहे चूल्हे ,
दे रहे प्रमाण सब जीव के ।
सुंदर सा सहर ,
जिसमें सब कुछ बसा है ।
बस किसी को आगे बढ़ने नहीं दिया,
बाकी ख़ुदमे ही सजा है ।
सुंदर सा वन है देवझिरी यह पर ,
ओर पहाड़ है हाथीपावा ,
सब मंदिरों से सजा ,
हमारा प्यारा झाबुआ।
अपनी एक पहचान के साथ ,
अपने एक त्यौहार के साथ ।
भगोरिया मनाते , भूम मचाते ,
खुदकी बोली , खुदका नृत्य,
सब कुछ है यहां।
अपने पन से बना
हमारा झाबुआ।।
रिया राणावत
कालीदेवी,झाबुआ(मध्यप्रदेश)




