साहित्य

झाबुआ

रिया राणावत 

एक ऐसा अंचल ,

जिससे खींचा सबने पीछे।

ना बढ़ना मिला ,

पर ना रुका वो,

छोटी छोटी झोपड़ियों में ,

जल रहे चूल्हे ,

दे रहे प्रमाण सब जीव के ।

सुंदर सा सहर ,

जिसमें सब कुछ बसा है ।

बस किसी को आगे बढ़ने नहीं दिया,

बाकी ख़ुदमे ही सजा है ।

सुंदर सा वन है देवझिरी यह पर ,

ओर पहाड़ है हाथीपावा ,

सब मंदिरों से सजा ,

हमारा प्यारा झाबुआ।

अपनी एक पहचान के साथ ,

अपने एक त्यौहार के साथ ।

भगोरिया मनाते , भूम मचाते ,

खुदकी बोली , खुदका नृत्य,

सब कुछ है यहां।

अपने पन से बना

हमारा झाबुआ।।

 

रिया राणावत

कालीदेवी,झाबुआ(मध्यप्रदेश)

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