
मन का दर्पण साफ़ अगर है
तो हर जगह तीर्थ नज़र आता है
कठौती का जल भी पावन लगे
हर बूंद में गंगा बहती जाती है
मंदिर-मस्जिद बाहर क्या ढूंढे
ईश्वर तो अपने भीतर बसता है
भाव सच्चे हों तो पत्थर भी
प्रभु का रूप धर लेता है
मन मैला तो गंगा भी मैली
मन निर्मल तो कंकड़ भी शंकर
श्रद्धा से झुके जो सिर अपना
उसके लिए हर द्वार है मंदिर
दूर-दूर भटके क्यों इंसान
शांति अपने मन में पाले
लोभ मोह को त्याग दे जब
कठौती में ही गंगा नहाले
भाव की गंगा बहा ले मन में
फिर कहीं न जाना पड़े
मन चंगा कर ले पहले तू
तो हर जगह तेरा तीर्थ खड़े
मौलिक, स्वरचित
डॉ संजीदा खानम शाहीन




