
पुष्पों की सुगंध से सुरभित वन-बाग बगरियांँ,
खिल उठे आँगन-चौबारे, चारों देहरियाँ।
गमक उठे तन- मन सबका सजें,
सब शृंगार करें नारियाँ,
सद्विचारों से हो सुवासित सबरे गाँव औ नगरियाँ।
ऐसी फुहार हवा संग बरसे,
आय मिलो साँवरिया,
भक्ति भाव से भक्तिन जोहे तेरे चरण-कमलिया।।
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन, सद्यः निःसृत, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर उत्तराखंड।।




