साहित्य
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निः स्वार्थ
मांँ जगत निःस्वार्थ की मूरत । देख जीती लाल की सूरत ।। पूजती है देव वह न्यारे । कष्ट हरती…
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भानु नित्य भोर में
भानु नित्य भोर में रश्मियाँ प्रसारता। भृंग बाग में सदा धुन मधुर सँवारता॥ पेड़ नित्य झूमते बाँह नित पसारते। पुष्प…
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टूटे सपने मगर संभल गया हूं
भरोसे की नींव पर, टिका था सारा संसार, पर पीठ पीछे तुमने, किया खंजर से वार। मीठी बातों में छुपा…
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प्रेम की नजर से देखो दुनिया बहुत रंगीन है
।।रचना शीर्षक।। ।प्रेम की नजर से देखो दुनिया बहुत रंगीन है। ।।विधा।।मुक्तक।। 1 क्यों जल -भून रहे हैं नफ़रत की…
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बचपन की बगिया
गर्मियों के दिन थे। ज़ब मैं छोटी थी तब मेरे राम जी चाचाजी ने अपने बग़ीचे के एक टोकरी आम…
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कपड़े(लघुकथा)
कपड़े(लघुकथा) “मृत व्यक्ति के कपड़े नहीं रखा जाता व एक हमारी बहू है जो इस दुनियाँ की है ही नहीं…
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वह लड़की, मुझे,,,,,,
वह लड़की मुझे अच्छी लगती वह अक्सर मुझे देख दूर से ही बेहद प्रसन्न हो जाती क्यों नहीं जानता पास…
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फिरते हैं बार बार जो
फिरते हैं बार बार जो अपने ज़बान से उनसे मिलाओ हाथ ज़माने में ध्यान से रखना ज़रा तुम अपने परों…
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हे गांधी
तुम उस निशान की तरह हो जो कुंए की जगत पर रस्सी के अनवरत घिसने से बन गई है। कितना…
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इन्द्रधनुष
विभिन्न रंगों से भरे हुए हो मेघों से मिलते रहते हो तुम सबको इतना भाते हो पास कभी न तुम…
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