साहित्य
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नारीवाद/महिला दिवस
औरों की तो पता नहीं पर मुझे समझ में आता नहीं। महिला दिवस या नारीवाद की जरूरत क्या है और…
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होली तो हो ली
होली तो हो ली मगर, उतरा नहीं खुमार । मुखमंडल बदरंग था, पर नैनों में प्यार ।।१।। ✍️ होली तो…
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अगर खामोशी लिखती
अगर खामोशी लिखती, तो लिखती उस पुरुष के बारे में, जिसे बचपन से ही ‘त्याग’ का पाठ पढ़ाया गया। “दे…
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चन्द्रशेखर आज़ाद
साक्षी है बलिदान की, धरती प्रयागराज। जहाँ गूँजी थी गोलियाँ, अमर हुए आज़ाद।। भाभरा की पावन धरा, जनमा सिंह-स्वरूप। माँ…
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गज़ल :- कहां चले गए मां-पापा, यूं मुंह मोड़कर
सभी को लगाया रंग, सिर्फ तुम्हें छोड़कर, कहाँ चले गए माँ-पापा, यूँ मुँह मोड़कर।। सूना पड़ा आँगन है, चौखट भी…
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समाज सेवा का फल–हास्य-व्यंग्य
मुर्गा सोते लोगों को जगाता है। जब सब गहन निद्रा में सोने का प्रयास करते हैं। वह बेचारा अपनी नींद…
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ये कामयाबी के इरादे
जीवन में कुछ करना है तो कामयाबी हासिल करनी है, रुकना नहीं है राहों में यारो बस आगे ही बढ़ते…
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विश्व महिला दिवस पर दस्तक देती विशेष कविता
ऊँची, ऊंची, हाथी देह सी, पहाड़ियाँ रात का धनधौर अँधेरा और वह मासूम भूख से बिलखता मां की गोद में…
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बचपन का मौसम
फिर न लौटेगा कभी मौसम सुहाना यह। फिर न झूमेगा सरल बचपन दिवाना यह।। याद आयेंगे मधुर दिन वो सुहाने…
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नगर के डगर में
नगर के डगर में , जहाॅं जहाॅं ठाॅंव बा । एने ओने घूम देखीं , उहें बसत गाॅंव बा ।।…
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