साहित्य
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कहां गये हो मानव तुम
अब तो सुंदर धरती सूनी होती जाती दिन पर दिन उजड़ रहे हैं रैन बसेरे कहां बनायें पक्षी घर बढ़…
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मंजिल
मन में हो संकल्प तो मंजिल कोई दूर नहीं, न उम्र बने बाधा संगी-साथी की परवाह नहीं। बस चाहत की…
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जहर बाँट कर क्या तू पाया
जहर बाँट कर क्या तू पाया, चिंतन कर तू मन में। छेड़-छाड़ करता कुदरत से, द्रुम को जड़ से काटा।…
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ग़ज़ल
जिसकी ख़ुशबू से महकती है मरी ज़ात अब भी, मेरी पोरों में उसी लम्स की थकन आज भी है। …
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झाबुआ
एक ऐसा अंचल , जिससे खींचा सबने पीछे। ना बढ़ना मिला , पर ना रुका वो, छोटी छोटी झोपड़ियों में…
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पर्यावरण दिवस के अवसर पर
1- पर्यावरण दिवस त्योहार पर, फायकू प्रस्तुत है, तुम्हारे लिए। 2–मानवता की सुंदर पहल, पर्यावरण दिवस अवसर, तुम्हारे लिए।…
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अंतर की बात
मन के गहरे सागर में जब, शांत लहरें सो जाती हैं। इच्छाओं के कोलाहल में , सारी चेतनाएँ खो जाती…
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आक्रमण के शिकार निर्दोष बच्चों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस
की सुरक्षा और अधिकारों पर गंभीर चिंतन का अवसर — अधिवक्ता कुमुद रंजन सिंह, पटना उच्च न्यायालय पटना,…
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खाखरे का दर्द
बचपन से हमारे झाबुआ आदिवासी पिछड़े अंचल के इस अद्भुत पेड़ से पत्ते से प्यार रहा, यह वह पेड़ है…
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