साहित्य
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गुनगुनी धूप अलसाई गुनगुनी धूप में बैठते ही भूली बिसरी यादों की तस्वीरें दिल पर बार बार दस्तक दे मन को टटोलने लगती है। कुछ खट्टी, कुछ मीठी यादें सुंदर तानो-बानो में सजी दिलों में दबे एहसासों को सहलाती जाने अनजाने बेवजह चली आती हैं। गुनगुनी धूप में अलसाई इन्द्रियाँ अनजाने के सफ़र पर निकल भूत, भविष्य और वर्तमान के अनछुए क़िस्से सुनाने लगती है। गुनगुनी धूप में बैठ बुने स्नेह धागों के ताने-बानो संग दिल्लगी, चुहलबाजी, हँसी ठिठोलियाँ अपनत्व का राग गुनगुनाने लगती है। शीतल हवाओं की मन्द मन्द छुअन लहलहाते फूलों की महक गुनगुनी धूप की गर्माहट सुकून का एहसास दिलाने लगती है। स्वरचित मौलिक रचना सुमन बिष्ट
अलसाई गुनगुनी धूप में बैठते ही भूली बिसरी यादों की तस्वीरें दिल पर बार बार दस्तक दे मन को टटोलने…
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खुश रहें
हक है सभी को खुश रहने का, अपनी-अपनी रची-रचाई दुनिया में। फिर चाहे वो जीव हो या जन्तु, चर हो…
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_पड़ गये ,होली के रंग फीके
गीत _पड़ गये ,होली के रंग फीके पड़ गये ,होली के रंग फीके। रिश्ते हो गये,तार-तार, ना अदबी रहे सलीके।…
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स्वयं के भीतर
लगे आज स्वयं के भीतर बरसों बाद लौटी आई वही असाहय, अकेली, तन्हाई और दर्द से घिरी बस कलम चला…
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हे! गुरुदेव प्रणाम आपके पावन श्रीचरणों में
हे! गुरुदेव शत शत मेरा,प्रणाम आपके चरणों में। जगत के समस्त तीरथ,धाम हैं आपके चरणों में।। भू पर सब धर्म…
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फागुन आया
रंग बिरंगा फागुन आया, खेल रहे सब होली। गली-गली में घूम रही है, हुरियारों की टोली।। नीले पीले लाल गुलाबी,कई…
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होली आई रे
होली आई रे,आई रे,होली आई रे। अमवा की डाली कोयलिया काली, वन उपवन सजी फूलों भरी डाली, गेंहूँ सरसों की…
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कब आओगे मोहन
कब आओगे मोहन अखियां तरह रही है दरश को तेरे ये कब से बरस रही है कहीं भूला तो ना…
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नारी जीवन का अर्थ,,,
कभी-कभी मैं सोचती हूं, नारी जीवन का क्या अर्थ है? दूसरों पर हर पल निर्भर रहे, क्या उसका जीवन व्यर्थ…
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होली
होली आई रे आई खेलो सब मिलकर भाई खुशी से हँसना खुशी से गाना । कुछ भीगी टोली होली मे…
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