साहित्य

कैसे

राजीव त्रिपाठी 

हक़ीक़त में सुनाऊ कैसे

राज़ दिल के तुम्हें बताऊंँ कैसे!!

बेख़ुदी का तो ये आलम हैं

रूठ कर तुमसे मैं जाऊंँ कैसे!!

हज़ार मौत हम रोज़ मर रहे हैं यहाँ

फासले दिल के बढ़ाऊ तो कैसे!!

मशवरा ले रहे हैं लोग हमसे रोज़ाना

मैं हक़ीक़त उन्हें बताऊंँ कैसे!!

अपनों का साथ तो मिलता नहीं है

तेरी दुनिया में चला आऊंँ तो कैसे!!

वह अगर हमसे साफ़ -साफ़ कह दे

उनके मैं सामने जाऊंँ कैसे!!

हद से बढ़ जाएगी रुसवाईयांँ मेरी

एहसास इस बात का दिलाऊँ कैसे!!

तुम मुझे बिना मक़्सद के चाहोगी

इत्तिफ़ाक़ ये ज़िंदगी का दिलाऊ कैसे!!

हमारी मौजूदगी अखरेगी रक़ीब को

उसका सदमा मैं बन जाऊँ कैसे!!

लाख लानत है तुम्हारी ज़िंदगी पर

एतिबार ज़िंदगी को दिलाऊँ कैसे..!!

 

स्वरचित- राजीव त्रिपाठी

उदयपुर राजस्थान

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