
रिमझिम बरसे बदरिया, पुरवा मचल रहीं।
भीगी-भागी डगरिया, खुशबू टहल रहीं॥
वन-उपवन की सु-कलियाँ, हँसकर निखर रहीं।
मोर पिया को पुकारे, पाँखें मचल रहीं।।
खोलें बदरिया आँचल, धरती सँभल रहीं।
हरियाली की चूनर, खेत पर ढल रहीं॥
पनघट गा रहे मंगल, सरिता उछल रहीं।
साजन की मधुर आहट, साँस में पल रहीं॥
अंबर बरसते निर्मल, जीवन बदल रहीं।
वर्षा की शुभ बेला, खुशी ही फल रहीं॥
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार




