साहित्य

  • प्रेम-प्यार-ममता

    माँ के प्यार का मोल नहीं,यही तो दुनिया में अनमोल। स्तन से लगा दूध पिलाए शिशु को,अद्वितीय बेमोल।। नि:स्वार्थ प्रेम…

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  • फागुन

    फागुन अपने रंग में, रंगे धरणी चित्त। रखे सहज आहार ज्यों ,रहे संतुलित पित्त।। सूखे पत्ते ने कहा ,हुआ हमारा…

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  • मैं स्त्री हूँ

    मै  स्त्री हूंँ …. तभी तो तुम कर पाते हो गर्व अपने पुरुष होने पर , मैं झुकती हूंँ तभी…

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  • चन्दौसी की होनहार बेटी- इशिता गुप्ता

    चन्दौसी की धरा से उगा आज उजाला है, इशिता ने परिश्रम से लिखा स्वर्णिम ज्वाला है। निन्यानवे दशमलव सत्तावन की…

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  • अष्टभुजा अवतार

    सुबह जल्दी उठकर काम निपटाती है सारे, बाऊ जी का गर्म पानी अम्मा की फिर चाय बनानी । घर में…

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  • नया सवेरा

    नई उम्मीद नया सपना लिए बैठे है, नई किरण नया सवेरा लिए बैठे है, नई क़दम नया मंज़िल लिए बैठे…

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  • इल्तिजा

    तुम्हारा ज़िक्र आते ही कहानी में सारे किरदार आंँखों में तैरने लगते हैं!! हमने तो ग़लती से तुझे चाहा था…

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  • ओजपूर्ण सजल : “नहीं!”

    अकेले हैं तो भी कोई ग़म नहीं, झुक के जी लें इतना भी कम नहीं। रोटियाँ सूखी सही, मान मगर…

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  • मेरा बचपन,,,

    अभावों में पला बढ़ा मेरा बचपन, बड़े-बड़े सपने देखा करता था। घर में खाने को रोटी ना हो पर, बुलंदियों…

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  • पेड़ की अभिव्यक्ति

    वह अक्सर मुझे लेकर दोनों पेड़ बाते करते हैं सचमुच बहुत ख्याल रखते हैं आज किसी कारण से में शाम…

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